(प्रा.साईनाथ पाचारणे,
यांच्या कवितांचे मुक्त अनुवाद)
1)
कौनसा दिन है आज ?
कितने बजे तेरी घडीमें ?
खोकली काल की डिब्बीमें
रचे हुए हिस्सेसे
बढता हुआ दिन घुमाता है
मेरी बरबाद जिंदगीको
अौर मैं बुनता हूँ
उसके साथ नश्वर जाल मेरे अस्तित्वका
मकडी की तरह
दुनिया घुमानेवाले
घडी के तीन पहिए संभालते है अपनी रिती
क्षण... मिनटोंको लेकर
घंटे भी बीत जाते है
जमी काई की पहचान
रखती है मेरी गलतीयोंका
अौर छुटे पलोंका
गिलगिला अनहोना हिसाब
काल अौर कलुटी जिंदगी को कौन रोंक सकता है
उसके साथ वही खोखले इतिहास का पन्ना
बारबार बनता है
दरदर ठोंकरे खातें
दिन के साथ चलते-चलते
कहाँ पहुँचा मैं
अब डुबने दो सूरज को
कालकोठरीमें
इतिहास के पन्ने खोलकर
बता मुझे
कितने बजे तेरी घडीमें ?
अौर कौनसा दिन है आज ?
2)
कौनसा रिश्ता है
उस लंबी छाँववाले के साथ
एकही मंदिरकी सिढीयाँ
चढते समय
वह सुलझा रहा था
हमारे बीच की जाँत-पाँत की पहेलीयाँ
मेरी हँसी,मेरी जुबाँ को
नदारद कर पूँछ रहा था बार-बार मेरा नाम और कूल
जाँत का अंदाजा लगाने के लिए
मेरी मित्रता को चाहकर भी
इन्साँ के रुप में
अजिबसी हरकते कर रहा था मेरे साथ
इन्सानियत के बंध जोडकर
मैं अकेला लांघ रहा था वह सिढीयाँ
तब भी वह बिखर रहा था
जाँती हिसाब की पोथी
पलभरही मिला इन्साँ के रूपमें
फिर भी हात में लेकर
जाँत की पताका
3)
बहुत दिनोंसे
सत्य उचका नही
बहुत दिनोंसे
असत्य झुका नही
धीरेधीरे अधनंगे
पुरे नंगे हो गए
बहुत दिनोंसे
आँखें मुंदी नही
सूरतपर सजाकर
बेशर्म भाव हूँ
बहुत दिनोंसे
शरमाया नही
मुफ्त के चंदन का
सुगंध फैला है
बहुत दिनोंसे
कष्टसे कसा नही
चखा सहजतासे
मानवता का खून
बहुत दिनोंसे
उसे थुंका नही
जान हथेलीपे रखे
ना छुअा कलम को
बहुत दिनोंसे
युद्ध खेला नही
*चाँद परछाई*
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