Saturday, 26 December 2020

गाँव के चौपाल पर

*गाँव के चौपालपर*
.        ( दीर्घ कविता )

गाँव के चौपाल पर
एक जैसे चेहरे के आदमी
जगह पर बैठ कर घूम आते है
एक एक पाँव लांघ कर
गलीके हर एक घर से
और एकदूसरे को जगह बना देते है
थोडे हटकर बैठते है
चिरबंधी ओयते पर बैठ कर
कहते जाते है महिफील को
मुझे कुछ जगह दो
चुटकी में पकड़ कर लाए
बहारदार चुटकुलों के लिए
अौर अंधेरे कमरे से लायी
सूरज के धूप की पुडी छोड़ते है
दो-चार आदमीयों के सामने

गाँव के चौपाल पर
निजी मामले होते है जाहिर
मनोरंजन के खमंग चुटकुले
एक-दूसरे को गुदगुदाने
रख देते है हथेली पर
सभी वक्त नहीं
परंतु कुछ समय करते है
शरीर को हल्कासा
दूजे की अवहेलना करते
इन्सान को इंसानियत से उठाकर
फिर बिठा देते हैं
गांव के लोगों में

गाँव के चौपाल पर
काले मकान सफेद हो जाते हैं
सफेद घर पर छोड़ देते हैं
काले दाग
पान तंमाकू के संस्कृती का
अतिशयोक्ति से
गंधमाला के लत की
शर्म दूर होती है
चौपाल के हरेपन को संरक्षित करने के लिए

साँझ होते-होते
चौपाल का कचरा वहीं छोड़कर
खुले मनसे घूसते हैं मंदिर में
चौपाल के पास ग्रामदेवता का
एक मंदिर होता ही है
पाप-पुण्य का हिसाब रखने के लिए

गाँव के चौपाल पर
एक टोली
हमेशा भीड़ करके ती है
बदलते प्रहरों के साथ
स्वभाव बदल जाते हैं 
कभी स्वभाव से जादा ठंड होकर
कभी स्वभाव से जादा भडक होकर        
तिखा-नमक लगाकर
अपने अनुभवों को करते हैं
ग्राम बोली में अनुवादित
कभी पाँव खुले छोड़ कर
कभी पाँव अकड़ कर

गाँव के चौपाल पर
अपनी यादों की डोर
लंबी करतें समय
बोलने वाले के लफ्ज़ कम पडते हैं
सुननेवाले की आँख में
स्पष्ट देखने लिए अपना प्रतिबिंब
इसलिए स्मृति शेष लफ्ज़ोंको
दौडाते है दम घूँटने तक

गाँव के चौपाल पर
मिलते हैं पग-पग पर
ठेंस पहुँचाने वाले आदमी
हल्दी-नमक लगाकर फूँक मारनेवाले
या तिखा-नमक लगाकर
जख्मको पिघलती रखने वाले
गाँव का पुराना दुख चबाते बैठनेवाले
या नए चेहरे का दुख
कौतूहल से बताने वाले
खुसुर फुसुर करते इर्द-गिर्द देखते
एक-दूसरे के और करीब
आते हैं इन्सा
इन्सान करीब आते हैं यही महत्त्वपूर्ण है
गाँव का
गाँव की एकता को बनाए रखने के लिए

गाँव के चौपाल पर
इकट्ठे हुए आदमियों के कंधे पर
बस, एक भव्य ध्वज
पालखी का डंडा ...
या राजनीति का झंडा
सुपारी चबाने के लिए पर्याप्त
होठों पर होती हैं
गली से लेकर  देहल्ली तक राजनीति
बैठक खत्म होने पर
राजनीति का चबाना चौथा थूँककर
हर कोई अपने घर को वापस चला जाता है
गाँवमे होता ही है हर एक को अपना मकान

गाँव के चौपाल पर
जो लोग
उठते-बैठते नहीं
उनके बारे में चर्चा जम जाती हैं
अथवा जो बीच में छोड़ देते हैं
उनकी गैरमौजूदगी में
धो डालते हैं उनकेही मैले कपड़ों का गट्ठर
बैठकीतमें हर एक होता है
महाभारत का संजय
मीडिया चॅनेल...
अगर चौंक में लगाया
सी सी टीव्ही कैमरा...
आने-जाने वाले हर एक की की जाती हैं
आय सी यु के शीशे से
सोनोग्राफी
सबकी बदनामी करते-करते
किए जाते है चर्चे
उपस्थित खुदको धोया हुआ चावल समझकर

गाँव के चौपाल पर
पान तंमाकू की पिंक से रंग जाता हैं
गाँव का हर एक कोना
थूँक क छीटें उड जाती हैं
गाँव के ही बदन पर
सभी मकान की दीवारें खराब होती है
आसमां धब्बों से मलिन होता है
और इसी तरह लग जाते हैं
हरे भरे खेत पर लाल पिंक के धब्बे
भले बूरे का िसाब छोड़कर
और ऐसे ही
खूब होता है समय इसलिए बिताते है

गाँव के चौपाल पर
आता है औरतो का विषय
कुरूप और सुंदर
दोनों का
शौहर के पीछे
अकेलापन झेलने वाली औरतों का
घर-बाहर के धागे तोड़नेवाली बहूओंका
जवानीको झोंके देते झूमने वाली
कुँवारीयों का

चर्चा करने वाले खुरज-खुरजकर
निकालते है
अपनी नुकीली नाखूनों से
रंगोली खिंचने वाली प्रत्येक औरत का
साफ-सुथरा आंगन नही बचता
देवकी तथा यशोमती का
औरतों के बारे में बोलते समय
उनकी जिभ में आया हुआ लालच का पानी खत्म नही होता कभी-भी
क्योंकि गाँवसे
शादी करके जाती है लड़कियाँ
फिर कुछ बहू बनकर आती रहती है

गाँव के चौपाल पर
बोलने वालोें के पास रहती है
एक उपन्यास लिखने लायक जानकारी
और प्रत्येक गाँव होता है एक-एक ग्रंथ
न लिखा हुआ
लेकिन सावन में पढ़े जानेवाले
ग्रंथ के समान
थोड़ा-थोड़ा हररोज पढ़ा जाता हैं

गाँव के चौपाल को टालकर
भीतर-बाहर कर नही सकते आने-जाने वाले कोई भी इन्सान
जो चौपाल पर पढ़ें जानेवाले ग्रंथ के पात्र होते है

प्रा. साईनाथ पाचारणे
     राजगुरुनगर, पुणे।

हिंदी अनुवाद

*चाँद परछाई*

कोल्हापुर

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