*🎯 कणा*
(मूळ कविता)
‘ओळखलत का सर मला?’ पावसात आला कोणी,
कपडे होते कर्दमलेले, केसांवरती पाणी.
क्षणभर बसला नंतर हसला बोलला वरती पाहून :
‘गंगामाई पाहुणी आली, गेली घरट्यात राहून’.
माहेरवाशीण पोरीसारखी चार भिंतीत नाचली,
मोकळ्या हाती जाईल कशी,
बायको मात्र वाचली.
भिंत खचली, चूल विझली, होते नव्हते नेले,
प्रसाद म्हणून पापण्यांवरती पाणी थोडे ठेवले.
कारभारणीला घेउन संगे
सर आता लढतो आहे
पडकी भिंत बांधतो आहे, चिखलगाळ काढतो आहे,
खिशाकडे हात जाताच हसत हसत उठला
‘पैसे नकोत सर,
जरा एकटेपणा वाटला.
मोडून पडला संसार तरी मोडला नाही कणा
पाठीवरती हात ठेउन,
फक्त लढ म्हणा’!
*कुसुमाग्रज तथा*
*वि.वा.शिरवाडकर*
(हिंदी अनुवाद)
. *रीढ़*
"क्या आपने मुझे पहचाना हैं, सर?" बारिश में कोई आया था,
कपड़े गिले थे, बालों पर पानी था।
चंद मिनटों के लिए बैठा, बोला बाद में उपर देखकर :
गंगा मैया आयी थी मेहमान बनकर, गयी घर में रहकर।
मैके आयी लड़की की तरह चार दिवारी में नाँच उठी
खाली हाथ कैसी जाएगी,
केवल पत्नी बच गई।
दीवार उखड़ गई, चुल्हा बुझ गया,
प्रसाद के रूप में पलकों पर थोड़ा पानी छोड़ गई, बाकी सब कुछ साथ ले गई।
पत्नी के साथ
सर अब लड़ रहा हूूँ,
गिरी हुई दीवार बना रहे हैं, कीचड़ को निकाल रहे हैं।
जेब की तरफ हाथ पहुँचते ही वह मुस्कुराकर उठा
नहीं चाहिए पैसा सर,
अकेलापन महसूस हुआ था थोड़ा।
टूट गया परिवार, लेकिन नहीं टूटी हड्डी रीढ़ की,
कहो 'लड़ते रहना' पीठ पर हाथ रखकर अपेक्षा दुआ की!
*चाँद परछाई*
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