चलते-चलते
🌹धरती का सम्मान🌹
परम पुनीता पावन बेला धरती के सम्मान की
आओ मिलकर गाथा गाएं भारत के अभिमान की
जिसका सरताज हिमालय हो चरणों में सागर का पानी
कल कल करती नदियाँ बहतीं मिलता कहीं नही सानी
नीलगगन मे कलरव करते पंछी के गुणगान की
आओ मिलकर गाथा गाएं भारत के अभिमान की
यहाँ बसन्ती बेला मे जब बगिया महक उठी सारी
और भोर की प्रथम किरण से नहा गई धरती सारी
हर तन मे फिर भर आए जो नए नवेले प्रान की
आओ मिलकर गाथा गाएं भारत के अभिमान की
फूल फूल मे प्यार महकता कली कली मुस्काती है
रास रचाते मौसम से तो पत्ती तक शर्माती है
रंग बिरंगे पहने हैं जो कुदरत के परिधान की
आओ मिलकर गाथा गाएं भारत के अभिमान की
नही सहज है गीत सृजन या सुनना और सुनाना भी
कुछ तो याद रखें हम खुद ही अपना फर्ज निभाना भी
रक्षण की सौगंध उठाएं कुदरत के वरदान की
आओ मिलकर गाथा गाएं भारत के अभिमान की
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